12 May 2017

अष्टावक्र महागीता

अष्टावक्र दुनिया के ऐसे व्यक्ति थे । जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया । न वे कवि थे और न ही दार्शनिक । चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के । उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी । उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है । शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं । ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है ।
अष्टावक्र ने जो कहा वह ‘अष्टावक्र गीता’ नाम से प्रसिद्ध है ।
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जनक, अष्टावक्र से पूछते हैं ।
जनक - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है । मुक्ति कैसे प्राप्त होती है । वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बताएं ।1।
अष्टावक्र - यदि मुक्ति चाहते हैं तो मन से विषयों (की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये । क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये ।2।
आप न पृथ्वी, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश ही हैं । मुक्ति के लिए इन तत्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए ।3।
यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें, तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे ।4।
आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं । ऐसा जानकर सुखी हो जाएँ ।5।
धर्म, अधर्म, सुख, दुःख मस्तिष्क से जुड़ें हैं, सर्वव्यापक आपसे नहीं । न आप करने वाले हैं, और न भोगने वाले । आप सदा मुक्त ही हैं ।6।
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